न वर्णा न वर्णाश्रमाचारधर्मा न मे धारणाध्यानयोगादयोपि।
अनात्माश्रयाहंममाध्यासहानात् तदेकोऽवशिष्ट: शिवः केवलोऽहम्॥
जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित "दशाश्लोकी" के यह श्लोक
७वी शताब्दी में वर्ण-व्यवस्था की धार्मिक मीमांसा और दर्शन में नगण्यता को दिखता है।
पिछली चर्चा (देखें) में हमने विश्व की सभी पुरातन सभ्यताओं के विकास क्रम में सहज रूप से कर्माधारित सामाजिक वर्गों या वर्णों का निर्माण होना पाया। आज भी विश्व की विभिन्न क्षेत्रो में इस प्रकार के सामाजिक वर्ग देखने को मिल जातें हैं - चाहे वह मेसो अमेरिकन क्षेत्रों में पाया जाने वाला वर्गीकरण हो (पेनिनसुलर, क्रिओल्लो , कास्तिजो , मेस्तिजो , चोलो , मूलतो, इन्डियो , जंबो मराकुचो इत्यादि) या अफ्रीकी महाद्वीप में पाई जाने वाली मंडे , जोनोव , वोलोफ, बोरना और उबुहके जातियाँ ; या हवाई की कहुना, अली'इ, मकाsइनना और कौवा जातियाँ; या इसी प्रकार जापान, चीन, या कोरिया के सामाजिक वर्ग...हर सामाजिक व्यवस्था में इन श्रम आधारित वर्गों का कोई न कोई रूप देखने को मिल ही जाता हैं। साथ ही इन सभी भौगालिक रूप से फ़ैली हुई सभ्यताओं का प्रथम दृष्टया अध्धयन सामान स्वरूप के वही तीन-चार वर्गों को दर्शाता हैं। ऐसे में भारतीय वर्ण-व्यवस्था को धार्मिक (वैदिक अथवा हिंदू) आधार पर स्वीकार करना अनुचित होगा। वस्तुतः यह वयवस्था सामाजिक विकास क्रम की ही स्वाभाविक परिणति हैं।
भारतीय संस्कृति में भी यह व्यवस्था श्रम-आधारित ही थी और इस प्रकार का वर्ग-विभाजन सामाजिक आवश्यकता के कारण ही उत्पन्न हुआ। इसे किसी भी रूप से धार्मिक और वैदिक नहीं माना जा सकता। इसी कारण भारतीय इस्लामिक और ईसाई पद्धतियों में भी जाति का स्वरुप बना रहा । (इसी कारण आज भी दलित ईसाई, मुस्लिम और सिखों की राजनीति भी हिंदू दलितों की तरह अपने परवान पर हैं।) इस विषय पर दक्षिण भारतीय विद्वान "के श्रीनिवासुलु" के विचार भी महत्वपूर्ण हैं - वे वर्ण व्यवस्था का आधार सिद्धान्तिक रूप से सामाजिक मानते हैं न की धार्मिक। "यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया , बर्कली " के "जोर्ज एल हार्ट" द्वारा किए तमिल संगम साहित्य और १००-७०० ईस्वी के बीच रचित अन्य दक्षिण भारतीय सहित्य अध्ययन के अनुसार भी वर्ण व्यवस्था वैदिक नहीं मानी जा सकती। अवैदिक समाज में भी एक प्रकार के वर्ग-विभाजन और पुजारी प्रधान समाज के रूप मिलते हैं (जोर्ज हार्ट के लेख "दक्षिण भारत में जाति के प्रारंभिक साक्ष्य" (Early Evidence for Caste in South India ) के अनुसार)। इस सम्बन्ध में विलियम क्रूक के सम्पूर्ण अवध (और मूल रूप से सारे भारतीय ) के वर्णों के बीच मानवीय संरचना के अध्ययन से (अन्थ्रोपोमेट्री स्टडी - anthropometry study) से निकला गया यह निष्कर्ष कि सभी भारतीय वर्ण एक ही मानव-प्रजाति के संतति हैं और उनमे कोई विजित और पराजित जातियों का मेल नहीं मिलता हैं - यह सिद्ध करता हैं की उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक वर्ण व्यवस्था का विकास सहज रूप से भारतीय उपमहादीप में हुआ। यहाँ पनपते समाज ने अपनी श्रम की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए वर्ण-व्यवस्था का विकास किया। (शूद्र समाज कोई आर्यों से पराजित जाति नहीं हैं।)
भारतीय समाज में कालांतर में उत्त्पन्न हुए मध्यम वर्ग (जैसेकि कायस्त ) भी वर्ण व्यवस्था के कर्मगत रूप को उजागर करता हैं। सामाजिक विकास के साथ जब कृषि और पशु-पालन जैसे प्राथमिक व्यवसायों को छोड़ कर शिल्प, कला और निर्माण जैसे व्यवसायों के विकास हुआ उनके साथ ही वाणिज्य, कर, राजस्व जैसे जटिल प्रक्रियाओं का भी उदय हुआ। इन जटिल सामाजिक विकास क्रम में समाज को एक नए मध्यम वर्ग की आवश्यकता हुई तो लेखाकारों, मुनिमो, महाजनों, धनिकों के नए समुदायों का जन्म हुआ। यह समुदाय चार वर्णों की परिभाषा पर पूर्ण रूपेण खरे नहीं उतरते किंतु यह समाज की आवश्यकता ही थी जिसने इन वर्गों को भी न केवल धार्मिक मान्यता ही दी किंतु साथ ही उन्हें उनके गुणों के आधार पर संकर वर्णों में भी जगह दी। उदाहरणार्थ - कायस्थों को ब्राह्मण और क्षत्रिय का मिला जुला रूप माना गया हैं नाकि मनु-स्मृति के अनुसार उन्हें सूत माना गया । ( स्पष्ट करना चहुँगा कि प्रचलित किम्वदंती के अनुसार - चित्रगुप्त के ब्रह्मा जी के काया से उत्पन्न होने वाले १७ वे पुत्र के नाते कई जगह कायस्थों को ब्राह्मण का ही रूप माना जाता हैं किंतु इस चर्चा में हम मानव इतिहास के आधार पर इस व्यवस्था को परख रहें हैं)।
भारतीय इतिहास के रूप को समझने के लिए प्राचीन काल के विदेशी यात्रियों के विवरण से उपयुक्त स्रोत क्या होगा। विदेशी पर्यटक बिना किसी सामाजिक प्रभाव के एक निष्पक्ष टिपण्णी प्रदान करते हैं। ३०६-२९८ ईसा पुर्व में मेगस्थनीज मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में सेल्यूकस का राजदूत बनकर रहा था। उसने अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में पाटलिपुत्र नगर की विस्तृत चर्चा की है। इसमे उसने चार वर्णों के स्थान पर सात वर्णों का उल्लेख किया हैं - दार्शनिक, कृषक, चरवाहे (पशु-पालक), शिल्पकार, योद्धा , निरीक्षक (अधिकारी) और मंत्री। इसके अतिरिक्त सम्राट तो प्रमुख होता ही था। इस प्रकार हम उस समाज में चार वर्णों का स्पष्ट रूप नहीं पाते हैं। जो इस बात को उजागर करता हैं कि या तो उस समय इन वर्णों का उदय नहीं हुआ था या फ़िर वे इतनी महत्ता नहीं रखते थे कि वे समाज में स्पष्ट रूप से दिखें। अन्य साक्ष्यों के आधार पर चाणक्य ब्राह्मण था यह बात सर्व-विदित हैं अतः प्रथम सिद्धांत कि उस काल में वर्ण व्यवस्था नहीं थी सत्य नहीं प्रतीत होती हैं। सो उस काल में वर्ण-व्यवस्था के बंधन और नियम उतने कठोरता से नहीं पालन किए जाते थे और उनका कोई भी महत्व नहीं था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को साधारण सैनिक से सम्राट बनाया किंतु उस समय भी जाति आड़े नहीं आयी। यहाँ तक कि चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी जाति के विभाजान को कहीं भी आधार नहीं बनाया गया हैं।
३९८ ईसवीं में चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन में आने वाले चीनी यात्री फाह्यान ने नालन्दा, पटना, वैशाली आदि स्थानों का भ्रमण किया। उसने भी अपने यात्रा वृतांतों में वर्ण व्यवस्था अथवा जाति प्रथा या समाज के किसी वर्ग के शोषण का उल्लेख नहीं किया हैं। इसी प्रकार ७वीं सदी में (६७३-६९२ ई.) भारत आगमन पर आए चीनी यात्री इत्सिंग के भी यात्रा-वृतांतों में जाति का उल्लेख नहीं मिलता।
हर्षवर्धन के शासनकाल (६४१ ई.) में भारत आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (ह्वेनसांग) ने अपने यात्रा-वृतान्त सी-यू-की में सिन्ध प्रदेश में शूद्र शासक क वर्णन किया हैं। अन्य साक्ष्यों के आधार पर उस समय सिंध में अन्तिम हिंदू शासक राजा दाहिर का शासन था -वे ब्राह्मण वंशज थे (और संभवतः अपनी सौतेली बहन से विवाह के कारण शूद्र माने जाने लगे हों।) । यह तो स्पष्ट नहीं हैं कि ह्वेन त्सांग ने उस शासन को शूद्र की उपाधि क्यों दी किंतु इस वर्णन से यह तो सिद्ध होता ही हैं कि राजकीय कार्य क्षत्रियों तक ही सिमित नहीं थे। उन्हें ब्राह्मण या शूद्र कोई भी कर सकता था।
आंध्र-प्रदेश के शूद्र वंशीय शासकों ने तो स्वयं अपनी शूद्रता पर गर्व करते हुए शिलालेख लगवाये (सिन्गामा-नायक, १३६८)। इनमें तीनो वर्णों से शूद्र वर्ण को शुद्धता के आधार पर श्रेष्ठ माना गया हैं। इसमें लिखा हैं कि जिस प्रकार प्रभु के चरणों से निकल कर गंगा पवित्र हैं वैसे ही ईश्वर के चरणों से उत्पन्न शूद्र भी पवित्र हैं। (के राम शास्त्री, एपिग्रफिया इंडिका संस्करण १३)। इसी प्रकार एक अन्य दक्षिण भारतीय शासक प्रोलाया भी शूद्र वंश में पैदा हुए थे। उन्होंने भी ईश्वर के चरणों से उत्पत्ति को भाग्यशाली मानते हुए कहा कि "पुंसः पुरानास्य पदादुदिर्नाम वर्णं यामाहु कलिकलावार्यम" (कुनाल)
इस प्रकार हम देखते हैं कि न केवल शास्त्रों के आधार पर बल्कि भारत के प्रारंभिक और मध्यकालीन इतिहास तक वर्ण व्यवस्था कोई भी जन्मगत आधार पर अवरोध नहीं उत्पन्न करती हैं। यह एक पूर्ण रूपेण सामाजिक व्यवस्था है जिसको धार्मिक ग्रंथों में कर्मगत आधार पर मान्यता तो मिली हैं किंतु उसके अनुपालन में कोई बाध्यता नहीं हैं। सभी वर्णों को सामान अवसर प्राप्त हैं। अपनी आगे की चर्चा में वर्ण व्यवस्था के परिवर्तनीय रूप को देखेंगे।
सादर,
सुधीर